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अपराध और दंड (जनसत्ता)

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले के एक और मामले में सजा सुनाया जाना एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक घटना है। हमारे देश में ताकतवर आरोपियों के खिलाफ चल रहे मामलों का अंजाम तक पहुंच पाना विरल ही रहा है। इसका अंदाजा विधायिका में शामिल अनेक लोगों के खिलाफ लंबित मामलों की प्रगति को देख कर आसानी से लगाया जा सकता है। लालू प्रसाद को बीते शनिवार को रांची की विशेष सीबीआइ अदालत ने चारा घोटाले से जुड़े चौथे मामले में चौदह साल की सजा सुनाई है और साठ लाख रु. का जुर्माना भी लगाया है। यह मामला दुमका कोषागार से 3.13 करोड़ रु. की अवैध निकासी से संबंधित है। अदालत ने उन्हें इस मामले में कुछ दिन पहले ही दोषी ठहराया था। लेकिन इतनी लंबी सजा की आशंका लालू प्रसाद और उनके परिवार को नहीं रही होगी। इस फैसले पर जिस तरह से राजनीतिक प्रतिक्रिया हुई है वह अनुमान के अनुरूप ही है। लालू प्रसाद के बेटे तेजस्वी यादव और राष्ट्रीय जनता दल के अन्य नेताओं को जहां फैसले में भारतीय जनता पार्टी का षड्यंत्र नजर आया है, वहीं भाजपा ने जैसा बोया वैसा काटा की उक्ति का प्रयोग करते हुए राजद को लालू प्रसाद यादव के किए की याद दिलाई है।

भाजपा ने पलटवार में यह भी कहा है कि जब चारा घोटाले के मामले में लालू प्रसाद को आरोपी बनाया गया, या जब घोटाले के पहले मामले में उन्हें सजा हुई तब केंद्र में राजग की सरकार नहीं थी। लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र के बरी हो जाने और लालू को सजा हो जाने को एक राजनीतिक संदेश में बदलने की कोशिश राजद ने शुरू कर दी है। दूसरी तरफ भाजपा और मोदी चाहेंगे कि भ्रष्टाचार को मुद्दा बना कर वे राजद के अलावा, उसके साथ खड़े होने के कारण, कांग्रेस को भी घेरें। लेकिन हाल के उपचुनाव नतीजे बताते हैं कि बिहार में कुछ अलग ढंग के समीकरण ज्यादा काम करते हैं। लालू प्रसाद के जेल में होने के बावजूद राजद ने इन उपचुनावों में भाजपा और जनता दल (यू) की सम्मिलित शक्ति को धूल चटा दी। फिर भी, लालू का जेल में रहना भाजपा के लिए राहत की बात हो सकती है। भाजपा के खिलाफ हमेशा मुखर रहे लालू प्रसाद गैर-भाजपा दलों को एकजुट करने की कोशिश भी करते रहे हैं।

अगले लोकसभा चुनाव की चुनौती के मद््देनजर भाजपा से निपटने की रणनीति बनाने की सुगबुगाहट विपक्षी दलों में शुरू हो गई है। इसमें कांग्रेस अपने ढंग से सक्रिय है, तो कई क्षेत्रीय दल गैर-भाजपा गैर-कांग्रेस संघीय मोर्चा बनाने की कवायद कर रहे हैं। ऐसे वक्त में लालू प्रसाद का राजनीतिक परिदृश्य से बाहर रहना विपक्ष के लिए एक गहरा झटका है। चारा घोटाले के मामलों में इतनी लंबी जांच चली और इतने सारे तथ्य आ चुके हैं कि नाहक फंसाए जाने का आरोप एक सियासी प्रतिक्रिया के अलावा और कुछ नजर नहीं आएगा। लेकिन क्यों न सीबीआइ को स्वायत्त बनाया जाए, ताकि किसी के इशारे पर उसके काम करने के आरोप के लिए गुंजाइश ही न बचे। यूपीए सरकार के समय भाजपा सीबीआइ को स्वायत्त बनाने की पुरजोर वकालत करती थी, पर अब उसने इस मामले में खामोशी क्यों अख्तियार कर ली है!

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