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अशांत श्रीलंका (जनसत्ता संपादकीय)

श्रीलंका के कैंडी में बौद्ध और मुसलिम समुदाय के बीच हुए दंगों को रोकने के मकसद से समूचे देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गई है। मगर ताजा घटनाक्रम इसलिए गंभीर है कि श्रीलंका को अभी सिंहलियों और तमिलों के बीच टकराव के दौर से निकले ज्यादा वक्त नहीं हुआ है। अलग-अलग समुदाय के बीच अक्सर उठे विवादों की वजह से वहां स्थिति अब भी संवेदनशील बनी रहती है। ऐसे में एक मामूली विवाद के बाद कैंडी में सिंहली बौद्ध और मुसलिम समुदाय के बीच हुई व्यापक हिंसा और उसमें कुछ लोगों के मारे जाने की घटना निश्चय ही श्रीलंका के लिए चिंता की बात है। शायद वह तमिलों और सिंहलियों के बीच सामुदायिक तनाव के दंश की याद और उससे बचने की कवायद ही है जिसके चलते श्रीलंका सरकार ने बौद्धों और मुसलमानों के बीच हिंसा के केवल कैंडी में सिमटे होने के बावजूद एहतियातन समूचे देश में दस दिन के लिए आपातकाल की घोषणा कर दी। इससे हिंसा को रोकने में मदद मिलेगी, लेकिन सवाल है कि आखिर वे कौन-सी वजहें हैं कि सड़क पर मामूली झड़प की घटना ने दोनों समुदायों के बीच इस कदर तनाव पैदा कर दिया!

दरअसल, सिंहली बौद्धों को शक है कि वहां कुछ लोगों पर इस्लाम कबूल करने का दबाव बनाया जा रहा है। जबकि मुसलिम समुदाय वहां खुद को धार्मिक उत्पीड़न का शिकार बताता है। गौरतलब है कि दो करोड़ से ज्यादा आबादी वाले देश में सिंहली समुदाय के लोगों की संख्या पचहत्तर फीसद है, जबकि मुसलिम समुदाय महज दस फीसद है। इसके अलावा, म्यांमा में कुछ समय पहले बौद्धों की ओर से व्यापक हिंसा के बाद रोहिंग्या मुसलिम शरणार्थियों ने अलग-अलग देशों में शरण ली, जिसमें श्रीलंका भी एक है। बौद्ध संगठन श्रीलंका सरकार के रोहिंग्या शरणार्थियों को जगह देने के रुख का भी विरोध करते रहे हैं। फिर एलटीटीई यानी लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम के रूप में तमिलों और सिंहलियों के लंबे टकराव की कहानी अभी पुरानी नहीं पड़ी है। यह भी सच है कि वहां के मुसलमानों को कभी तमिल राष्ट्र के लिए लड़ने वाले एलटीटीई के साथ नहीं माना गया। मगर सांप्रदायिक हिंसा में आमतौर पर यथार्थ के मुकाबले धारणाएं हावी होती हैं। इसलिए कोई मामूली घटना भी चिंगारी का काम करती है, जो कैंडी में हुई।

करीब चार साल पहले श्रीलंका में सिंहलियों और मुसलमानों के बीच बड़े पैमाने पर दंगे हुए थे। जब एम. सीरीसेना सत्ता में आए थे, तब उन्होंने मुसलिम विरोधी हिंसा के मामलों की जांच कराने का वादा किया था। पर उस मामले में टालमटोल का रवैया ही अपनाया गया। इसी का फायदा वहां के स्थानीय चुनावों में पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे की पार्टी ने उठाया। एलटीटीई का डर दिखा कर ध्रुवीकरण की राजनीति की और सिंहली अस्मिता को उकसाया गया। अगर ताजा हिंसा की जड़ में उसी ध्रुवीकरण से पैदा स्थितियां हों तो हैरानी की बात नहीं। भारत को भी इस पर नजर रखने की जरूरत है, क्योंकि श्रीलंका में ध्रुवीकरण की राजनीति आगे बढ़ती है तो उसका असर यहां पड़ सकता है। इससे पहले श्रीलंका तमिल विद्रोहियों के साथ संघर्ष के दौरान करीब तीन दशक तक आपातकाल का सामना कर चुका है। अब वह नहीं चाहेगा कि फिर कोई नया सांप्रदायिक टकराव हो। इसलिए जरूरत इस बात की है कि ऐसे टकराव से निपटने के लिए दीर्घकालिक उपाय किए जाएं।

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