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कलम के कातिल (जनसत्ता)

एक ही रोज, सोमवार को दो पत्रकारों की हत्या हुई, एक बिहार में और एक मध्यप्रदेश में। स्तब्ध कर देने वाली ये दोनों घटनाएं इसी तरफ इशारा करती हैं कि पत्रकारों के लिए ईमानदारी से अपना काम करना किस हद तक जोखिम-भरा हो गया है। मध्यप्रदेश के भिंड में एक टीवी पत्रकार को रेत ढोने वाले ट्रक से कुचल कर मार डाला गया। जबकि बिहार के आरा में मामूली विवाद के बाद एक पत्रकार और उनके साथी पर स्कॉर्पियो वाहन चढ़ा दिया गया। मध्यप्रदेश के भिंड और मुरैना जिलों सहित बुंदेलखंड-चंबल संभाग में रेत और पत्थर माफिया किस तरह से अपना साम्राज्य चला रहे हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। सोमवार को मारे गए टीवी पत्रकार ने अपना कर्तव्य निभाते हुए पुलिस और माफिया गठजोड़ के खिलाफ कई खबरें की थीं, इसलिए वे इनकी आंख की किरकिरी बने हुए थे। निडरता के साथ पत्रकारिता करने वालों पर ऐसे हमले जहां राज्य की कानून-व्यवस्था को कठघरे में भी खड़ा करते हैं, वहीं हमारे लोकतंत्र की बाबत गहरी चिंता का विषय हैं।
मध्यप्रदेश में इस तरह की यह कोई पहली घटना नहीं है। जिसने भी खनन, शराब, चिटफंड जैसे अवैध धंधों का पर्दाफाश करने की कोशिश की, उस पर माफिया की गाज गिरी। कइयों को अपनी जान तक गंवानी पड़ी। लेकिन सरकार ने माफियाओं पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं दिखाई। इससे अपराधियों के हौसले और बुलंद होते गए हैं। वर्ष 2012 में रेत और पत्थर माफिया के खिलाफ अभियान छेड़ने वाले एक नौजवान आइपीएस अधिकारी पर ट्रक चढ़ा कर मौत के घाट उतार दिया गया। इसी तरह बालाघाट में लंबे समय तक खनन माफिया के खिलाफ खबरें करने वाले एक पत्रकार को अपहरण के बाद जला कर मार दिया गया। पुलिस-माफिया गठजोड़ के खिलाफ लिखने वालों, स्टिंग आपरेशन करने वालों पर इतने हमले हो रहे हैं, पर ताज्जुब है सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही। आठ जून, 2015 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में एक पत्रकार को उसके घर के बाहर जला कर मार डाला गया। इस घटना में राज्य के एक मंत्री का हाथ होने की बात सामने आई थी।

भारत जैसे देश में पत्रकार कितने सुरक्षित हैं, पिछले दो साल में हुई घटनाएं यह बताने के लिए काफी हैं। जून 2015 से नवंबर 2017 तक बारह पत्रकार मारे गए। इनमें वे पत्रकार भी हैं जिनकी आवाज कुछ स्वयंभू ‘हिंदू-रक्षक’ सहन नहीं कर पा रहे थे। पत्रकारों पर इस तरह के हमले उन्हें निडर होकर काम करने से रोकने की कोशिश हैं। कैसी विडंबना है कि एक तरफ भ्रष्टाचार रोकने के वादे और दावे रोजाना जोर-शोर से किए जाते हैं और दूसरी तरफ भ्रष्टाचार उजागर करने वालों की जान हमेशा खतरे में रहती है! पत्रकारों की सुरक्षा के लिए बनी अंतरराष्ट्रीय समिति ‘कमेटी टु प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स’ ने अपनी रिपोर्ट में आगाह किया है कि भारत में पत्रकारों को काम के दौरान पूरी सुरक्षा नहीं मिल पाती और जो पत्रकार भ्रष्टाचारियों को बेनकाब करने में जुटे हैं, उनकी जान को खतरा है। क्या इसी तरह देश भ्रष्टाचार से निपटेगा? क्या हमारा लोकतंत्र इसी तरह से काम करेगा? कानून का शासन चलेगा या माफिया की मर्जी चलेगी?

सौजन्य -जनसत्ता।

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