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चीन से कारोबार में संतुलन की चाह – डॉ. जयंतीलाल भंडारी (नईदुनिया)

विगत सोमवार को नई दिल्ली में आयोजित भारत-चीन के मध्य संयुक्त आर्थिक समूह की बैठक से कई अहम तथ्य निकलकर सामने आए। इस बैठक में भारत के वाणिज्य मंत्री सुरेश प्रभु व उनके चीनी समकक्ष झोंग शैन के साथ दोनों देशों के उच्च अधिकारियों ने भी शिरकत की, जिसमें द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने तथा चीन के साथ भारत के बढ़ते व्यापार घाटे में कमी लाने की जरूरत पर बल दिया गया। भारतीय वाणिज्य व उद्योग मंत्री सुरेश प्रभु ने स्पष्ट कहा कि भारत का बढ़ता हुआ व्यापार घाटा दोनों देशों के आर्थिक एवं वाणिज्यिक संबंधों की राह में एक चिंताजनक मुद्दा बना हुआ है। भारत की ओर से खासकर कृषि उत्पादों जैसे सरसों, सोयाबीन, बासमती और गैर-बासमती चावल, फल, सब्जी, शकर के अलावा टेक्सटाइल, दवाइयों और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में चीन को किए जा रहे निर्यात में आ रही मुश्किलों की ओर ध्यान दिलाया गया। इस पर चीन के वाणिज्य मंत्री शैन ने कहा कि भारत-चीन व्यापार के संदर्भ में भारत का जो लगातार बढ़ता व्यापार घाटा है, उसके मद्देनजर चीन का यह प्रयास होगा कि वह दीर्घकाल में इसी तरह नहीं बढ़े।

गौरतलब है कि वर्ष 2017 में भारत-चीन के मध्य आपसी व्यापार का आंकड़ा 84.44 अरब डॉलर की ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंच गया। विगत वर्ष में चीन को भारत का निर्यात 16.34 अरब डॉलर मूल्य का रहा, जबकि चीन से भारत ने 68.10 अरब डॉलर का आयात किया। यानी वर्ष 2017 में चीन के साथ द्विपक्षीय व्यापार के तहत भारत का व्यापार घाटा 51.76 अरब डॉलर रहा। जबकि वर्ष 2016 में चीन को भारत से 11.76 अरब डॉलर मूल्य के निर्यात किए गए और चीन से 58.33 अरब डॉलर का आयात हुआ। इस तरह व्यापार घाटा 46.57 अरब डॉलर का रहा। गौरतलब है कि वर्ष 2017 में भारत और चीन के मध्य आपसी व्यापार ने नई बुलंदियों को तब छुआ, जब दोनों देशों के बीच डोकलाम विवाद और अन्य मुद्दे मसलन चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा, चीन द्वारा जैश-ए-मोहम्मद के मसूद अजहर पर संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंध के भारतीय प्रयास में अड़चन, परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत के प्रवेश पर चीन का ऐतराज इत्यादि छाए रहे। यह अच्छी बात है कि आपसी व्यापार बढ़ाने के लिए दोनों देशों की सरकारें तनाव कम करने का प्रयास कर रही हैं। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने विगत 8 मार्च को सार्वजनिक रूप से कहा था कि भारत के हाथी और चीन के ड्रैगन को आपस में लड़ने के बजाय साथ मिलकर डांस करना चाहिए। जाहिर तौर पर उनके कहने का आशय यही था कि दोनों देश साथ मिलकर विभिन्न् क्षेत्रों में नए आयाम तय करें। इसी तरह भारत ने भी दलाई लामा के भारत में आगमन के 60 वर्ष पूर्ण होने पर धन्यवाद समारोह दिल्ली के बजाय धर्मशाला में आयोजित किए जाने का संकेत देकर भविष्य में अच्छे संबंधों का रास्ता निकाला है।

संयुक्त आर्थिक समूह की बैठक में चीन के वाणिज्य मंत्री झोंग शैन ने जिस तरह भारत को ज्यादा अहम व्यापार भागीदार बनाने का संकेत दिया, उससे इस संभावना को बल मिला है कि इस साल भारत-चीन के बीच द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर के लक्ष्य को छू सकता है। द्विपक्षीय व्यापार की ऐसी ऊंचाई के साथ यह बेहद जरूरी है कि भारत से चीन को निर्यात तेजी से बढ़ें। हमें चीन के बाजार में भारतीय सामान की पैठ बढ़ाने के लिए उन क्षेत्रों को चिन्हित करना होगा, जहां चीन को गुणवत्तापूर्ण भारतीय सामान की दरकार है। वस्तुत: गुणवत्तापूर्ण उत्पादों के मामले में भारत चीन से बहुत आगे है। ख्यात वैश्विक शोध संगठन स्टैटिस्टा और डालिया रिसर्च द्वारा मेड इन कंट्री इंडेक्स में उत्पादों की साख के अध्ययन के आधार पर कहा गया है कि गुणवत्ता के मामले में मेड इन इंडिया उत्पाद मेड इन चायना से आगे हैं। इस इंडेक्स में उत्पादों की साख के मामले में चीन भारत से सात पायदान पीछे पाया गया। चूंकि भारतीय उत्पाद विश्वस्तरीय गुणवत्ता वाले होते हैं, लिहाजा ऐसा कोई कारण नजर नहीं आता कि चीन के लोग व कंपनियां इनकी ओर आकर्षित न हों। खासतौर से चीन में प्रदूषण कानून सख्त होने से बड़ी संख्या में औद्योगिक इकाइयां बंद हो गई हैं। ऐसे में भारत चीन के बाजार में ऑटो कम्पोनेंट, स्टेनलेस स्टील, इन्वर्टर, कॉटन यार्न, लेदर सामग्री आदि का निर्यात तेजी से बढ़ा सकता है। वह अपनी सूचना प्रौद्योगिकी, बायोटेक्नोलॉजी, फार्मास्युटिकल, इंजीनियरिंग, चिकित्सा विज्ञान आदि का डंका भी चीन में बजा सकता है।

संयुक्त आर्थिक समूह की बैठक में चीन ने यह जरूर कहा कि वह कृषिगत उत्पादों, दवा और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे कई क्षेत्रों में भारत से निर्यात की बाधाओं को कम करने का प्रयास करेगा, लेकिन इसे लेकर हम ज्यादा उम्मीदें नहीं पाल सकते। ज्ञातव्य है कि चीन ने इस बैठक में जिस तरह भारत के व्यापार घाटे को कम करने की बात कही है, ऐसी ही बात सितंबर 2014 में दोनों देशों के बीच हुए पंचवर्षीय द्विपक्षीय व्यापार संतुलन के समझौते में भी कही गई थी, जिसके तहत 2019 तक भारत का व्यापार घाटा कम होने का परिदृश्य उभरना था, लेकिन यह समझौता बाध्याकारी नहीं था, अतएव इस दिशा में प्रगति देखने को नहीं मिली। बल्कि वर्ष 2014 के बाद भारत का व्यापार घाटा लगातार बढ़ता हुआ ही दिखाई दे रहा है। ऐसे में भारत को चीन पर लगातार यह दबाव बनाए रखना होगा कि वह इस व्यापार असंतुलन को दूर करने की दिशा में ठोस कदम उठाए। यह भी जरूरी है कि हम चीन को निर्यात बढ़ाने की नई रणनीति के साथ आगे आएं।

चीन के साथ व्यापार घाटा कम करने व भारत से चीन को निर्यात बढ़ाने के लिए सरकार द्वारा निर्यातकों को हरसंभव प्रोत्साहन देना होगा। चीन से व्यापार में मुकाबला करने के लिए भारत को कम लागत पर गुणवत्तापूर्ण उत्पादन करने वाले देश के रूप में अपनी पहचान और पुख्ता करनी होगी। हमें अपनी बुनियादी संरचना में व्याप्त अकुशलता व भ्रष्टाचार पर नियंत्रण कर अपने प्रॉडक्ट की उत्पादन लागत कम करनी होगी। चीन की तरह भारत को भी गुड गवर्नेंस की स्थिति बनानी होगी। प्रतिस्पर्द्धा में सतत सुधार तथा वित्तीय मानदंडों के प्रति जवाबदेही पर ध्यान देना होगा। भारत में श्रमशक्ति के कौशल प्रशिक्षण और लॉजिस्टिक के मोर्चे पर जो दिक्कतें दिखाई दे रही हैं, उन्हें दूर करना होगा। हमें ‘मेक इन इंडिया अभियान को सफल बनाना होगा। इसके लिए ऐसे युवाओं की जरूरत होगी, जो प्रशिक्षित कुशल कर्मी हों। इसके लिए उद्योग मंत्रालय व सरकार का सहयोग कर रहे नैस्कॉम संगठन ने पहले चरण में एक वर्ष में 40 लाख युवाओं को कौशल प्रशिक्षण देने की जो रणनीति बनाई है, उसे जमीनी स्तर पर क्रियान्वित करना होगा। हम आशा करें कि ऐसे प्रयासों से भारत से चीन की ओर निर्यात बढ़ेंगे, चीन से आयात घटेगा और फलत: व्यापार घाटे में भी कमी आएगी।

(लेखक अर्थशास्त्री हैं)

सौजन्य – नईदुनिया।

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