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मानव तस्करी पर लगे रोक(दैनिक जागरण)

झारखंड में मानव तस्करी धड़ल्ले से जारी है। पश्चिम सिंहभूम, सरायकेला-खरसावां, खूंटी, गुमला, रांची, गढ़वा, साहिबगंज, सिमडेगा, गोड्डा, लातेहार और लोहरदगा जैसे कई जिले मानव तस्करी के गढ़ बन गए हैं। इन जिलों से तस्कर हर दिन गरीब युवतियों और बच्चों को रोजगार दिलाने के नाम पर दिल्ली, चेन्नई, मुंबई समेत अन्य महानगरों में भेज रहे हैं। गांवों में सक्रिय दलाल परिजन को मोटी रकम का लालच देकर उनसे बच्चे हड़प लेते हैं। जब कोई बड़ी घटना होती है तो मामले का खुलासा होता है। हाल ही में पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले की अदालत ने छह मानव तस्करों को दस-दस साल की सजा सुनाई है। सरगना सरायकेला-खरसावां जिले का युवक है। उसने पुरुलिया की लड़की को शादी का झांसा देकर फंसाया और बेच दिया।

कोल्हान प्रमंडल में सबसे बुरी स्थिति पश्चिम सिंहभूम की है। मानव तस्करी के मामले में यह दूसरे नंबर पर आता है। एक गैरसरकारी रिपोर्ट के मुताबिक यहां हर महीने 17 से 20 बच्चे मानव तस्करी के शिकार हो रहे हैं। जिले के चक्रधरपुर, गोईलकेरा, सोनुवा, गुदड़ी, मनोहरपुर व आनंदपुर प्रखंडों में सबसे ज्यादा मानव तस्करी हो रही है। इसकी वजह यहां की गरीबी और अशिक्षा है। साथ ही, रेलमार्ग से जुड़े होने के कारण आसानी से तस्कर बच्चों को लेकर महानगरों की ओर कूच कर जाते हैं। बीते वर्ष इस जिले में 200 से अधिक मासूम छुड़ाए गए थे। चिंता की बात यह है कि झारखंड में इस गोरखधंधे को रोकने की कवायद जमीन पर ठीक तरह से नहीं उतर पा रही है। स्वयंसेवी संगठनों का अभियान तभी तक जारी रहता है, जबतक फंड उपलब्ध होता है। राज्य में 2011 से ही मानव तस्करी रोकने की कवायद जारी है। परिणाम शून्य है। सरकार ने पहली बार गुमला, सिमडेगा, दुमका और खूंटी जिले में मानव तस्करी रोकने के लिए इकाई गठित की थी। इसके बाद रांची, पश्चिम सिंहभूम, लोहरदगा, पलामू में भी कवायद की गई पर इनकी भूमिका कठघरे में है। यहां न तो बच्चों की सूची है, न ही संसाधन है। कागज में स्वतंत्र इकाई घोषित होने के बावजूद इन्हें पर्याप्त संख्या में पुलिस अधिकारी, वाहन और कैमरे आदि नहीं मिल पाए हैं। मानव तस्करी पर रोक लगाने के लिए सरकार को और अधिक सख्त होना होगा। जिलों में कार्यरत यूनिट को पर्याप्त संसाधन मुहैया कराना होगा। लगातार मॉनीटरिंग करनी होगी।

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