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मूर्तियों का ढहाया जाना लोकतांत्रिक व्यवस्था में भारतीय मूल्यों और मर्यादाओं के खिलाफ है (दैनिक जागरण)

त्रिपुरा में भाजपा की प्रबल जीत के बाद वामपंथी विचारधारा के प्रतीक और रूसी क्रांति के नेता व्लादिमीर लेनिन की प्रतिमा को जिस तरह ढहाया गया उसकी निंदा ही की जा सकती है। यह सही है कि त्रिपुरा में वाम दलों के शासन से लोग उकता गए थे और लेनिन की प्रतिमा को गिराकर उन्होंने एक तरह से अपने असंतोष को ही प्रकट किया, लेकिन उनका तरीका अनुचित और अवांछित ही कहा जाएगा। किसी को भी वैसा अधिकार नहीं दिया जा सकता जैसा त्रिपुरा में भाजपा समर्थकों ने जबरन अपने हाथों में ले लिया और बुलडोजर लेकर लेनिन की प्रतिमा को ध्वस्त कर दिया। लोकतंत्र में इस तरह की मनमानी के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता। ऐसी मनमानी न केवल भारतीय मूल्यों और मर्यादाओं के खिलाफ है, बल्कि कानून के शासन को भी नीचा दिखाने वाली है। आखिर मूर्ति भंजकों से पीड़ित देश में उस तरह किसी प्रतिमा का ध्वंस कैसे किया जा सकता है जैसे त्रिपुरा में किया गया? इसके दुष्परिणाम सामने आने ही थे और वे आए भी।

त्रिपुरा में लेनिन की प्रतिमा नष्ट किए जाने के जवाब में कोलकाता में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा को नष्ट-भ्रष्ट करने की कोशिश की गई। विडंबना यह है कि यह कृत्य उन्होंने किया जो लेनिन की प्रतिमा ढहाए जाने का विरोध कर रहे थे। एक प्रतिमा के ध्वंस के जवाब में किसी अन्य की प्रतिमा को नष्ट करने की कोशिश उन्माद के अलावा और कुछ नहीं। देश को इस उन्माद से बचाने की जिम्मेदारी सभी राजनीतिक दलों की है। नि:संदेह जो सत्ता में हैैं उनकी अधिक है। यह अच्छा हुआ कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने त्रिपुरा और तमिलनाडु में पेरियार की प्रतिमाओं को क्षतिग्रस्त करने की कोशिश की निंदा की। उम्मीद है त्रिपुरा के भाजपा समर्थक यह समझेंगे कि उन्होंने अपनी पार्टी की शानदार जीत का जश्न फीका करने का ही काम किया।

इसमें संदेह नहीं कि वामदलों के लिए लेनिन एक क्रांतिकारी नेता हैैं, लेकिन उन्हें यह भी स्मरण रहे तो बेहतर कि दुनिया लेनिन को उनकी ही नजर से नहीं देखती और इसका कारण यह है कि रूसी क्रांति के दौरान बहुत से लोग मारे गए थे। इन लोगों की मौत के लिए लेनिन ही जिम्मेदार थे, जो यह मानते थे कि विरोधियों को कुचले बगैर क्रांति नहीं आ सकती। यही कारण रहा कि सोवियत संघ के विघटन के बाद कई देशों में लेनिन की प्रतिमाओं को ढहाया गया। ऐसा लगता है कि त्रिपुरा में भाजपा की जीत से उत्साहित लोग यह भूल गए कि यह काम वहां की सरकारों अथवा स्थानीय प्रशासन की ओर से किया गया, न कि भीड़ के द्वारा। जब किसी सड़क, पार्क आदि का नाम बदलने का काम भी एक तय प्रक्रिया के तहत ही हो सकता है तो फिर किसी प्रतिमा को हटाने-गिराने का काम भीड़ कैसे कर सकती है? नि:संदेह वाम दल लेनिन से प्रेरणा लेने और उनके गुण गाने के लिए स्वतंत्र हैैं, लेकिन वे इस देश पर उनकी विचारधारा जबरन नहीं थोप सकते। दुर्भाग्य से उन्होंने यही किया है और इसी कारण जहां-जहां उनकी मौजूदगी है वहां-वहां राजनीतिक हत्याएं अधिक होती हैैं।

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