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संपादकीयः ध्वंस का उन्माद (जनसत्ता संपादकीय)

जिस तरह एक के बाद एक कई महापुरुषों की प्रतिमाएं गिराए या तोड़े जाने की घटनाएं हुर्इं वे बेहद शर्मनाक और अफसोसनाक हैं। इन घटनाओं से जहां देश के भीतर नाहक कटुता पैदा हुई, वहीं दुनिया में एक लोकतांत्रिक देश के रूप में भारत की साख को धक्का लगा है। देश के कुछ हिस्सों में प्रतिमाओं को क्षतिग्रस्त करने की घटनाओं की प्रधानमंत्री ने उचित ही निंदा की है और दोषी लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी है। इसके साथ ही, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों को दो बार निर्देश जारी किया कि इन घटनाओं में लिप्त लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए और ऐसी घटनाएं रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं। इन घटनाओं से सरकार का चितिंत होना स्वाभाविक है।

अगर ये घटनाएं नहीं थमीं तो प्रतिमा ध्वंस का सिलसिला कहां जाकर खत्म होगा, कौन जानता है! लेकिन सवाल है कि सरकार को चेतने में देर क्यों लगी? सबसे पहले त्रिपुरा में सोवियत क्रांति के जनक और कम्युनिस्ट विचारक लेनिन की प्रतिमा ढहाई गई। तब इसकी निंदा करने के बजाय भाजपा के कई नेता घुमा-फिरा कर इसे सही ठहराते रहे, यह कहते हुए कि यह वामपंथी शासन के दौरान दमन के शिकार रहे लोगों द्वारा अपने रोष का इजहार है। आजादी मिलने के बाद बहुत-से औपनिवेशिक निशान हटाने की घटनाओं से भी इसकी तुलना की गई। लेनिन की मूर्ति ढहाने को परोक्ष रूप से उचित ठहराने में त्रिपुरा के राज्यपाल तक शामिल हो गए, जबकि नई सरकार के शपथ ग्रहण से पहले कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी उन्हीं की थी।

फिर बात यहीं नहीं रुकी। तमिलनाडु से ताल्लुक रखने वाले भाजपा के राष्ट्रीय सचिव एच राजा ने एक फेसबुक-पोस्ट डाल कर पेरियार की मूर्ति का भी लेनिन की मूर्ति जैसा ही हश्र किए जाने की धमकी दे डाली। इसके कुछ ही घंटों बाद वेल्लोर में पेरियार की प्रतिमा गिरी हुई और खंडित अवस्था में मिली। इससे तमिलनाडु का सियासी पारा चढ़ गया। उधर कोलकाता में जनसंघ (भाजपा के पूर्व-रूप) के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी और मेरठ के एक गांव में दलितों के प्रेरणा-स्रोत भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा के साथ तोड़-फोड़ की खबरें आर्इं। इस सब पर संसद के भीतर भी काफी हंगामा हो चुका है और बाहर भी। इन घटनाओं में कौन लोग शामिल थे, यह देखना संबंधित राज्य की पुलिस का काम है। पर इन घटनाओं से जो सामान्य सबक लिया जाना चाहिए वह यह कि सहिष्णुता के बगैर न तो कोई लोकतांत्रिक व्यवस्था चल सकती है न समाज में शांति कायम रह सकती है। दूसरा सबक यह है कि सत्ता के साथ जवाबदेही आती है। त्रिपुरा में जनादेश हासिल करने के बाद भाजपा ने यह सबक याद क्यों नहीं रखा?

पश्चिम बंगाल में चौंतीस साल वाम मोर्चे का राज रहा। लेकिन वाम मोर्चे को शिकस्त देकर ममता बनर्जी आर्इं, तो वहां लेनिन की मूर्तियां नहीं तोड़ी गर्इं। लेनिन की मूर्ति गिराने के पीछे यह दलील देना कि वे भारत के नहीं थे, निहायत बेतुकी दलील है। जिन महापुरुषों ने तमाम देशों में बहुत-से लोगों को प्रभावित किया है और दुनिया भर में अपनी छाप छोड़ी है, लेनिन उनमें से एक हैं। गांधी की भी मूर्तियां बहुत-से देशों में हैं। रवींद्रनाथ ठाकुर की भी। लेनिन, गांधी, पेरियार और आंबेडकर और श्यामाप्रसाद मुखर्जी से असहमत होने और उन्हें अपना आदर्श न मानने का किसी को भी हक है। लेकिन इनमें से किसी की भी प्रतिमा तोड़ना-ढहाना एक ऐसा उन्माद है जिसकी लोकतंत्र में कोई जगह नहीं होनी चाहिए। लोकतंत्र का अर्थ सिर्फ चुनाव नहीं होता, सहिष्णुता और सौहार्द भी होता है।

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