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संपादकीय: जहर और अंदेशे(जनसत्ता )

सीरिया रूस और अमेरिका दोनों के लिए शक्ति प्रदर्शन का अखाड़ा बना हुआ है। अमेरिका, ईरान पर पाबंदियां लगा ही चुका है। ईरान को रूस का पूरा समर्थन है, इससे भी अमेरिका खफा है। इसलिए रासायनिक हथियारों के नाम पर रूस को भी इराक की तरह घेरने की कोशिश हो सकती है।

 रूस के खिलाफ अमेरिका और पश्चिमी देशों ने जिस तरह से अभियान छेड़ा हुआ है, वह किसी युद्ध से कम नहीं है। पूर्व रूसी जासूस सर्गेई स्क्रिपल और उनकी बेटी को ब्रिटेन में जहर देने की घटना के बाद रूस और पश्चिम के रिश्ते नाजुक दौर में पहुंच गए हैं। अमेरिका और आस्ट्रेलिया सहित अट्ठाईस पश्चिमी देशों ने अब तक डेढ़ सौ से ज्यादा रूसी राजनयिकों को निकालने जैसा कड़ा कदम उठाया है। इनमें नाटो भी शामिल है। यूरोपीय संघ ने भी मास्को से अपने राजदूत को बुला लिया। कुल मिला कर ऐसा परिदृश्य बन गया है जो दुनिया के दो खेमों में बंटने की ओर इशारा कर रहा है। शीतयुद्ध के दौर के बाद अमेरिका की रूस के खिलाफ यह सबसे बड़ी कार्रवाई है। अब यह सवाल खड़ा हो गया है कि रूसी जासूस को जहर देने की घटना के बहाने क्या रूस की घेरेबंदी की तैयारी की जा रही है? क्या इसके पीछे अमेरिका के अपने हित काम कर रहे हैं?

दरअसल, पूर्व रूसी जासूस और उनकी बेटी को जहर देने से भी बड़ा मुद्दा यह बन गया है कि जिस जहर यानी नर्व एजेंट से दोनों पर हमला किया गया, वह आया कहां से? यह जहर विवाद का केंद्र बिंदु है जिसके जरिए आने वाले समय में रूस पर शिंकजा कसा जा सकता है। ब्रिटेन शुरू से कहता आ रहा है कि पूर्व जासूस पर हमला रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के इशारे पर हुआ है। पर रूस भी इसका पुरजोर खंडन कर रहा है। हालांकि जांच अभी चल रही है। कोई साफ तस्वीर सामने नहीं आई है। यह नर्व एजेंट ‘नोविचोक’ एक तरह का रासायनिक हथियार बताया जा रहा है जिसे 1970 से 1990 के बीच रूसी वैज्ञानिकों ने तैयार किया था। रासायनिक हथियारों पर पाबंदी लगाने और इनकी जांच व निगरानी का काम करने वाली संस्था ने इस नर्व एजेंट को रासायनिक हथियार नहीं माना है। पूर्व जासूस को दिए गए जहर की जांच कई देशों की प्रयोगशालाओं में चल रही है। इसलिए रहस्य तो जांच के बाद ही खुलेगा।

यह घटना वैश्विक राजनीति के नजरिए से काफी गंभीर है। इसके संदेश काफी दूर तक जाते हैं। हाल में रूस के राष्ट्रपति चुनाव में पुतिन को जो भारी जीत मिली है, वह अमेरिका के लिए किसी झटके से कम नहीं है। सीरिया रूस और अमेरिका दोनों के लिए शक्ति प्रदर्शन का अखाड़ा बना हुआ है। अमेरिका, ईरान पर पाबंदियां लगा ही चुका है। ईरान को रूस का पूरा समर्थन है, इससे भी अमेरिका खफा है। इसलिए रासायनिक हथियारों के नाम पर रूस को भी इराक की तरह घेरने की कोशिश हो सकती है। चीन की ताकत से भी अमेरिका घबराया हुआ है। शी चिनफिंग अब आजीवन राष्ट्रपति बने रहेंगे और दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती गतिविधियों ने अमेरिका की नींद उड़ा दी है। अमेरिका इस भय से ग्रस्त है कि आने वाले समय में रूस, चीन, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया जैसे देशों का समूह उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती होगा। यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के बीच ब्रेक्जिट का मुद्दा है। यूरोपीय संघ के देश ब्रिटेन को नाराज नहीं कर सकते, पर हर मुद्दे पर उसके इशारों पर चलेंगे, यह संभव नहीं है। सबके अपने-अपने हित और चिंताएं हैं। ऐसे में विश्व शांति का मुद्दा गौण है। महाबलियों की लड़ाई में कमजोर और गरीब देशों का भविष्य क्या होगा, यह भी सोचा जाना चाहिए!

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